मूलनिवासी, देवासुर संग्राम, दाशराज्ञ युद्ध और वामी इतिहासकारों के पाप :डॉ पवन विजय



एमपी नाउ डेस्क

स्वतंत्र लेख

जेएनयू में एक नारा लगता रहा है 'ब्राह्मण तो विदेशी है जिसका जीन विदेशी है'। यह नारा वहां पर काम करने वाले इतिहासकारों की शै पर गढ़ा गया। अकादमिक ही नही वरन कम्पटीशन की तैयारी करवाते संस्थानों के शिक्षकों ने भी यही पढ़ाना शुरू किया जिसका जहरीला परिणाम यह हुआ कि प्रशासनिक व्यवस्था में जो लोग आए वे सनातन संस्कृति के प्रति दुराग्रही थे। खैर दिक्कत की बात यह थी कि इनके तर्क की काट क्या है इसके बारे में मेहनत और पढ़ने की जहमत राइट विंगर पहले नही करते थे। कोउ नृप होइ हमई का हानी की तर्ज पर ऐसे ही सब चलता रहा और वामियों के कुत्सित प्रयास पूरे होते रहे। 


मूल निवासी की छद्म धारणा पर आते हैं। मूलनिवासी के सहारे वामियों ने भारत के उस वर्ग को डिस्क्रेडिट करना चाहा जो एक लंबे समय से पढ़ने लिखने का काम करता आ रहा था। बताया गया कि संविधान में उल्लेखित सवर्ण पुराने आर्य हैं जोकि विदेशी हैं और दलित ओबीसी यहाँ तक कि अल्पसंख्यक लोग मूल निवासी है।  यह पाखण्ड सरकारी प्रयासों से खूब फला फूला। 

आर्य बाहर से आये और देवासुर संग्राम जोकि दाशराज्ञ युद्ध ही था जिसमें देवों ने दानवों को परास्त कर पूरे भारत को अपना उपनिवेश बना लिया और दानवों को दास बनाया। तब से लेकर यह व्यवस्था आज तक चल रही है। कितनी हैरानी की बात है कि होलिका, महिसासुर , रावण जैसे लोगों को मूलनिवासी घोषित कर दिया गया। इतना बड़ा पाखण्ड और वह भी अकादमिक जगत में होता था। 

प्रजापति दक्ष की दो कन्याएं थीं। दिति और अदिति। दोनों का विवाह कश्यप से हुआ जिससे देव और दानव उतपन्न हुए। अर्थात देवों और दैत्यों के पिता एक थे, नाना एक थे फिर दैत्यों को भारत के बाहर का बता कर देवों को बाहरी घोषित कर दिया गया।  इस पाखण्ड का पर्दाफाश भारतीय पुरातविकविदों ने  राखीगढ़ी के साक्ष्यों से किया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर  कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के  अनुसंधान में यह सिद्ध हुआ है कि सारे भारतीय  गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है।

शोधकार्य में वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई। इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में आर्य और द्रविड़ विवाद व्यर्थ है। उत्तर और दक्षिण भारतीय एक ही पूर्वजों की संतानें हैं। उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, दलित, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं। इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाए जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।

अब आते हैं कि इससे निपटा कैसे जाए तो आप सभी से एक अनुरोध है। विकिपीडिया से लेकर जानकारी के जितने स्रोत हैं सब में एडिट का विकल्प होता है। आप देखिए और ऐसी छद्म बातों को वहीं एडिट करिये। यही सनातन को हमारा गिलहरी योगदान होगा। जहाँ मौका मिले वहाँ पर यह लिखिए।


लेखक के स्वयं के विचार है

 डॉ पवन विजय 
सोसोलोजिस्ट एंड राइटर
GGSIP यूनिवर्सिटी दिल्ली

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