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संजीब पालीवाल की "नैना" दिव्य प्रकाश दुबे की इब्नेबतूती के बारे में राकेश कायस्थ की राय।

संजीब पालीवाल की "नैना" दिव्य प्रकाश दुबे की इब्नेबतूती के बारे में राकेश कायस्थ की राय।



एमपी नाउ डेस्क

Review:-इस साल मैंने जितनी भी किताबें पढ़ी हैं, उनमें से ज्यादातर नॉन फिक्शन हैं। लंबे समय बाद मैंने इसी हफ्ते दो उपन्यास भी खत्म किये। पहली किताब नई वाली हिंदी के पोस्टर ब्वॉय दिव्य प्रकाश  दुबे की इब्नेबतूती है। दूसरी किताब संजीव पालीवाल का चर्चित क्राइम थ्रिलर नैना है।
संजीव जी के साथ मैंने न्यूज रूम में ठीक-ठाक वक्त बिताया है। ये वो दौर था, जब इस देश के आम नागरिक न्यूज़ चैनलों को सम्मान और उम्मीद की नज़र से देखते थे। खबरें बकायदा चलती थीं। बड़े-बड़े स्टिंग ऑपरेशन होते थे और मंत्रियों तक की नौकरियां जाती थीं। 

संजीव पालीवाल लेखक नैना

संजीव पालीवाल को मैंने हमेशा एक सजग संपादक और चुस्त प्रशासक के रूप में देखा। पत्रकारिता से इतर उनकी लेखकीय प्रतिभा का अंदाजा पहली बार उस वक्त हुआ जब अजित अंजुम की पहल पर हंस ने मीडिया विशेषांक निकाला। संजीव जी कहानी बम विस्फोट ने खूब चर्चा बटोरी थी और अब पहला उपन्यास नैना सामने आया है।
जो न्यूज़ रूम मैं करीब दशक भर पहले छोड़ आया था वो मेरी आँखों के सामने फिर से जिंदा हो गया। ऐसा लगा कि कई किरदारों को मैं ठीक से जानता हूं और पत्रकार के रूप में हमने जिन घटनाओं को देखा है, वो दिलचस्प किस्सागोई की शक्ल में ढलकर सामने आ गई हैं। सस्पेंस, नाटकीयता और घटनाओं का प्रवाह कुछ ऐसा है कि किताब कब खत्म हो जाती है, इसका पता भी नहीं चलता। संजीव जी ने कुछ देर से लिखना शुरू किया लेकिन नैना ने उन्हें जितने पाठक दिये हैं,यकीनन वो उन्हें लगातार लिखते रहने को प्रेरित करेगा।  
दिव्य प्रकाश दुबे युवा पीढ़ी के उन लेखकों में हैं, जिन्होने ना  सिर्फ नया शिल्प गढ़ा है बल्कि  अपने पाठक भी गढ़े हैं। विमोचन, समीक्षा, ईर्ष्या और साधुवाद से दूर अगर पिछले सात-आठ साल में खालिस लेखक-पाठक  रिश्तों पर आधारित हिंदी का कोई समानांतर संसार बना है तो उसकी बहुत बड़ी वजह दिव्य प्रकाश जैसे लेखक हैं ।

दिव्य प्रकाश दुबे लेखक इब्नेबतूती

इब्नेबतूती अमेजन पर धड़ाधड़ बिक रही है। लोग सोशल मीडिया पर खूब समीक्षाएं  लिख रहे हैं। इसलिए अलग से ज्यादा बात नहीं करुंगा। सिर्फ इतना कहूंगा कि कथाभूमि और लेखन शैली दोनों मामले में इब्नेबतूती मुझे दिव्य की पिछली तीन किताबों से कहीं ज्यादा अच्छी लगी। एक बेटा जिसने अपनी माँ की उंगली पकड़कर चलना सीखा वो उसी माँ का हाथ पकड़कर अतीत के उस गलियारे में ले जाता है, जहाँ उसकी मां बीस साल की एक लड़की थी। 

इस अनोखी यात्रा के रास्ते में अफसानों की बिखरी हुई कड़ियां मिलती हैं, जो कभी भावुक करती हैं तो कभी जिंदगी को लेकर एक बहुत अलग नज़रिया पेश करती हैं। 
जो लोग ये मानते हैं कि हिंदी में किताबें बिल्कुल नहीं बिकती हैं उन्हें कम से कम यह समझने के लिए इब्नेबतूती ज़रूर पढ़ना चाहिए कि आखिर कंटेट और शिल्प में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से लांच होते ही ये किताब बिक्री के रिकॉर्ड  तोड़ रही है।

लेख राकेश कायस्थ
        मुम्बई


mpnow.in

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