नाटक एक उलझा हुआ मांझा है, निर्देशक उसे सुलझाता है

नाटक एक उलझा हुआ मांझा है, निर्देशक उसे सुलझाता है


एमपी नाउ डेस्क

◆नाट्यगंगा ऑनलाइन पाठशाला- सोलहवा दिन

छिंदवाड़ा । नाट्यगंगा छिंदवाड़ा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन एक्टिंग की पाठशाला धीरे धीरे अपने चरम पर पहुंच रही है। जैसे जीवन का सोलहवा साल होता है वैसे ही रोमांचकारी सोलहवी क्लास भी रही। वर्धा महाराष्ट्र से श्री हरीश इथापे जी ने अपने अकल्पनीय ज्ञान से प्रशिक्षणार्थियों सहित उपस्थित अतिथियों को भी आश्चर्यचकित कर दिया। रंग संवाद वो संवाद है जो किसी भी क्षेत्र, या सीमा से बंधा हुआ नही होता, फिर चाहे वह किसी भी भाषा में हो और न ही रंगमंच की कोई क्षेत्रीय भाषा होती है। आज इसी बात को देश को मराठी रंगमंच के जाने माने सुप्रसिद्ध प्रयोगवादी निर्देशक श्री हरीश इथापे जी ने सिध्द कर दिया। आज का दिन सभी निर्देशकों का दिन था या यूँ कहें कि हरीश दादा ने तय कर लिया था कि आज का दिन हर कलाकार में एक कुशल निर्देशक को जन्म देने का है, कलाकार को आज हर वो बात पता होनी जरूरी है जो एक अच्छे निर्देशक में होनी चाहिए। आज की क्लास लगभग 3 घण्टे चली जिसमे नाटक के जन्म से लेकर उसे दर्शक तक पहुँचाने की जो यात्रा होती है उसका पूरा वर्णन था, इतना ही नहीं मंच के ब्लॉक से लेकर नाटक के कलाकर और निर्देशकों के प्रकार हरीश दादा द्वारा इतने विस्तार और मनोरंजक तरीके से बताए गए कि लगा जैसे सारे दृश्य हमारे सामने ही चल रहे हों। उनको सुनते हुए साफ साफ समझ मे आ रहा था कि वे कितने कुशल निर्देशक हैं। नाटक एक उलझा हुआ मांजा है जिसे सुलझा कर दर्शकों के सामने लाने का काम होता है निर्देशक का होता है। जितना कुशल उसका निर्देशन होगा उतना ही सुलझा हुआ मांजा होगा उसका। इसके लिए आवश्यक है कि हम प्रकृति की सुंदरता को महसूस करें उसकी बनावट को अपने अंदर लाने का प्रयास करें केवल ऐसा काम न करे जो हवा में गोली दागने जैसा लगे। क्योंकि यह सर्व विदित है कि एक रंगकर्मी समाज को नई दिशा देता है, इतिहास साक्षी है कि दुनिया मे जितने भी बड़े बदलाव आए हैं वो रंगमंच की ही बदौलत आए हैं। नाटक समाज का आइना होता है तो हम समाज को जो आइना दिखाएंगे उसमे वह अपना वही स्वरूप देखेगा। इसलिए निश्चित तौर पर एक रंगकर्मी की जिम्मेदारी समाज के प्रति बहुत बढ़ जाती है और खासकर उस निर्देशक की जिसने किसी नाटक को समाज के सामने खड़ा करने का निर्णय ले लिया हो। आज अतिथि के रूप में संजय तेनगुरिया जी, नेताराम रावत जी, ब्रजेश अनय जी और विनोद विश्वकर्मा जी उपस्थित रहे। कार्यशाला के निर्देशक श्री पंकज सोनी, तकनीकि सहायक नीरज सैनी, मीडिया प्रभारी संजय औरंगाबादकर और मार्गदर्शक मंडल में श्री वसंत काशीकर, श्री जयंत देशमुख, श्री गिरिजा शंकर और श्री आनंद मिश्रा हैं। आज की मुख्य बातें-अच्छा निर्देशक समझदारी, साझेदारी, उत्साह के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। रंगमंच एक कर्मभूमि है जिसके प्रत्येक खंड को समझकर ही इसका सर्वात्तम उपयोग संभव है।किस प्रकार का दृश्य मंच के किस भाग में किया जाना चाहिए।निर्देशक किस तरह अपनी टीम से समन्वय बैठाता है। निर्देशक को कलाकारों को कठपुतली नहीं समझना चाहिए। कलाकारों के बाहरी शरीर से ज्यादा उनके आंतरिक शरीर का प्रयोग निर्देशक को करना चाहिए।कलाकार को स्वतंत्रता देना ही निर्देशक का काम है। आज कार्यशाला का संचालन पीयूष जैन ने ओर आभार प्रदर्शन श्रीमती नीता वर्मा ने किया ।


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