बेडि़यों को तोड़कर ही बन सकते हैं अच्छा रंगकर्मी-भारतेंदु कश्यप

बेडि़यों को तोड़कर ही बन सकते हैं अच्छा रंगकर्मी-भारतेंदु कश्यप


एमपी नाउ डेस्क

★ऑनलाइन पाठशाला- अठारहवा दिन


 छिंदवाड़ा । नाट्यगंगा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय ऑनलाइन एक्टिंग की पाठशाला के अठारहवे दिन देश के प्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक भारतेंदु कश्यप कलाकारों से रूबरू हुए। आप रंगमंच में अपनी अलग सोच और तरीके लिए जाने जाते हैं। आप भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनउ से प्रशिक्षित हैं। आपने देश के सिद्धहस्त रंगनिर्देशकों के साथ रंगकर्म किया है। आपने बहुत से अच्छे नाटकों का निर्देशन भी किया है। रंगमंच और आधुनिकता इस विषय पर बोलते हुए आपने सबसे पहले आधुनिक या मॉडर्न शब्द पर बात की कि यह होता क्या है। सिर्फ नई तकनीक को अपना लेना ही आधुनिकता नहीं होती। सिर्फ अंग्रेजी होने से या पश्चिमी वस्त्रों को पहन लेने से ही आप मॉर्डन नहीं हो जाते हो। आधुनिकता धारण नहीं अपनाई जाती है। आपको विचारों से भी आधुनिक होना पड़ेगा। जरूरी नहीं कि आप साइंस के विद्यार्थी हो तो मॉर्डन कहलाओगे। मॉर्डन तो आप तब कहलाओगे जब आपकी सोच भी साइंटिफिक होगी। क्या फायदा यदि आप खगोलशास्त्र से स्नातक होने के बाद भी ग्रहण स्नान के लिये गंगा जल में डुबकी लगाते हो। या पीलिया और चिकनगुनिया की झाड़ फूंक करवाते हो। हमारी मान्यताएं, परम्पराएं, हमारे पूर्वाग्रह और हमारी रूढि़याँ दरअसल वो बेडि़यां हैं जो हमें आधुनिक होने से रोकती हैं। यही मानसिक बेडि़याँ आपको जात पात, धर्म ,रंग और लैंगिकता के आधार पर भेदभाव से जकड़े हुए है। यह बेडि़याँ आपको दकियानूस बना देती है। दकियानूसी मानसिकता इंसान को पाखंडी बना देती है। दरअसल इन मानसिक बेडि़यों की जड़ें बहुत गहरी हैं। भारतेंदु कश्यप ने पाषाण युग की बातों को स्लाइड शो के माध्यम से दिखाया। पाषाण युग के सुराग हमें पुरातात्विक खोजों और भित्तिचित्रों में मिलते हैं। शिकार करते आदिमानवों के इन चित्रों पर प्रकाश डालते हुए उन्हांन प्रश्न पूछा कि शिकार करने कौन जाता होगा ? जाहिर है शिकार एक सामूहिक कार्य होता था। जिसे समूह के सभी स्वस्थ लोग मिलकर करते थे जिनमें स्त्री और पुरूष दोनों ही शामिल थे। शिकार युग से ही पुरुषों ने जान लिया था कि अपनी एकाग्रता,चपलता ,चुस्ती और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण के कारण स्त्रियों का शिकार का प्रदर्शन पुरुषों से कहीं अच्छा है। यह बात आज भी देखने को मिलती है कि परीक्षाओं में लड़कियों का प्रदर्शन लड़को से कहीं अच्छा होता है। लेकिन उनकी प्रतिभा को रसोई और घर की चारदीवारी में चुनवा दिया जाता है। यही शिकार युग मे हुआ। औरतों को पुरुषों ने भोजन व्यवस्था और बच्चों के लालन पालन में फंसा दिया। दुनिया के प्रथम अविष्कार चक्के का अविष्कारक कोई मर्द था या औरत ? चित्रों में तो किसी मर्द को दिखाया गया है। पर क्या पता कोई औरत रही हो। दरअसल इतिहास और आख्यानों को,जिसमें सभी धर्मों के ग्रंथ भी शामिल हैं मर्दों ने अपने हिसाब से गढ़ा है। जिसमें उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। औरतों को, दलितों को ,शोषितों को षड्यंत्र पूर्वक हासिये पर डाल दिया गया। अपनी तमाम मनमर्जियों पर धर्म का मुलम्मा चढ़ाया गया। देखते देखते यह धरती कब धर्मो के चंगुल में फंस गई पता ही नहीं चला। बातों ही बातों में भारतेंदु ‘ डार्क एज ‘ का भी जिक्र छेड़ देते हैं। कुल मिलाकर एक सभी पहलुओं को छूती हुई शानदार क्लास रही आज की। आज अतिथि के रूप में महिन्दर पाल जी, मुकेश उपाध्याय जी, ब्रजेश अनय जी और विनोद विश्वकर्मा जी उपस्थित रहे। आज का संचालन फैसल कुरैशी और आभार सचिन मालवी ने व्यक्त किया। कार्यशाला के निर्देशक श्री पंकज सोनी, तकनीकि सहायक नीरज सैनी, मीडिया प्रभारी संजय औरंगाबादकर और मार्गदर्शक मंडल में श्री वसंत काशीकर, श्री जयंत देशमुख, श्री गिरिजा शंकर और श्री आनंद मिश्रा हैं।

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