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 छठवा दिन नाट्यगंगा ऑनलाइन पाठशाला  जीवन जीना सीखाता है शौकिया रंगमंच

छठवा दिन नाट्यगंगा ऑनलाइन पाठशाला जीवन जीना सीखाता है शौकिया रंगमंच

एमपी नाउ डेस्क


छिंदवाड़ा । आज नाट्यगंगा एक्टिंग की पाठशाला के छटवे दिन के रंग गुरु के रूप में श्री राजीव अयाची जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। राजीव सर किसी भी रंगकर्मी के लिए आदर्श हैं, जिन परिस्थितियों में उन्होंने दमोह जैसी जगह पर रंगकर्म को जीवित किया वो अविश्वसनीय लगता है। राजीव सर पिछले 31 वर्षां से रंगमंच पर सक्रिय हैं। ढेर सारी व्यक्तिगत समस्याओं से गुजरते हुए भी न सिर्फ आपने दमोह में रंग मशाल को जलाया अपितु पूरे देश में उसे पहचान दिलवाई। आज अयाची सर को सुनकर सभी सुखद आश्चर्य से भर गए। आज का विषय था “शौकिया रंगमंच की चुनौतियाँ“। इस विषय पर बोलते हुए श्री अयाची जी ने अपनी रंग यात्रा कैसे प्रारम्भ की तथा उनके सामने क्या क्या चुनौतियां आई इस बारे में विस्तार से चर्चा की। उनके अनुसार शौकिया रंगमंच एक चुनौतियों भरा रास्ता है। लेकिन यह हमें प्रत्येक परिस्थितियों से लड़ना सिखाता है। सर के अनुसार शौकिया रंगमंच एक इंसान को जीवन जीने की कला सिखाता है इसलिए प्रत्येक अभिभावक को अपने बच्चों को व्यक्तित्व विकास के लिए शौकिया रंगमंच करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। नाट्यगंगा के कलाकारों के साथ ही छिंदवाड़ा से तथा पूरे देश से कलाकार इस कार्यशाला से जुड़ रहे हैं। आज संस्था की ओर से आभार स्वाति चौरसिया ने व्यक्त किया। आज कार्यशाला में 35 कलाकारों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। कार्यशाला के निर्देशक श्री पंकज सोनी, तकनीकि सहायक नीरज सैनी, मीडिया प्रभारी संजय औरंगाबादकर और मार्गदर्शक मंडल में श्री वसंत काशीकर, श्री जयंत देषमुख और श्री आनंद मिश्रा हैं। आज की मुख्य बातें-
-हर रंगकर्मी की शुरुआत शौकिया रंगमंच से होती है।
-शौक़िया रंगमंच एक खूबसूरत एहसास है, परन्तु इसमे बहुत चुनौतियाँ भी है।(चूँकि ये छोटे शहरों में ज़्यादा अपनाया जाता है ,इसलिए भी परेशानियाँ बढ़ जाती है )जैसे - नाटक का चयन करना,बिना ट्रेनिंग के काम करना, आत्मविश्वास जगाना, नाटकों के लिये आडिटोरियम का न होना, रिहर्सल के लिये स्थान न होना, कैरेक्टर चुनना, समय निकालना, आर्थिक चुनौतियाँ, समाज से लड़ना, नाटक की सूचना पहुँचाना , दर्शक इकठ्ठा करना आदि।
-शौक़िया रंगमंच में अनेक चुनौतियाँ है लेकिन इसका अपना ही एक मज़ा है।
-आत्मविश्वास जगाने के लिये नुक्कड़ नाटक करना चाहिए।
- कैसे शौक़िया रंगमंच की निरंतरता को जीवित बनाए रखा जा सकता है। जो सामाजिक रूप से बहुत ज़रूरी है।
-शौकिया रंगमंच में आर्थिक लाभ नहीं होता परंतु ये अपनी जिजीविषा, रंगमंच के प्रति भावना, इच्छाशक्ति , सामूहिकता एवं रंगमंच को ज़िंदा रखने की लगन है।
-शौक़िया रंगमंच एक ताकत है, एक हथियार है, जिससे समाज को एवं समाज मे खुद को ज़िंदा रख सकते हैं।
-इससे हमारे व्यक्तित्व में निखार आता है, आत्मविश्वास बढ़ता है, पहचान मिलती है,।
-इसके साथ ही शौक़िया रंगमंच में क्षेत्रीय बोली, भाषाओं, लोककलाओं को विकसित करना भी ज़रूरी है।
राजीव अयाची

mpnow.in

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