पांचवा दिनकलाकारों ने सीखा रंगसंगीत, कथागायन और टायमिंग

पांचवा दिनकलाकारों ने सीखा रंगसंगीत, कथागायन और टायमिंग

एमपी नाउ डेस्क

नाट्यगंगा ऑनलाइन पाठशाला- छिंदवाड़ा की अग्रणी नाट्य संस्था नाट्यगंगा द्वारा आयोजित ऑनलाइन रंगमंच और सिनेमा की पाठशाला के पांचवे दिन अतिथि विद्वान के रूप में नई दिल्ली से सुशील शर्मा जी पधारे। जिन्होंने कलकारों को रंगसंगीत, कथागायान और अभिनेता की टायमिंग के विषय में बहुत ही कुषलता से प्रशिक्षित किया। सुशील शर्मा ने अपनी लग्न और रंगकर्म की अटूट निष्ठा से बहुत कम उम्र में ही भारतीय रंगमंच में अपनी जगह बना ली। वे बहुमुखी कलाकार हैं तथा 27 वर्षां से रंगमंच से जुड़े हैं। नाट्य संगीत में तो उन्हें महारत हासिल ही है साथ ही वे उम्दा एक्टर भी हैं। ख़ासकर टाइमिंग के वे मास्टर हैं। पिछले 10 वर्षां से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दिल्ली तथा भारत के कई राज्यों में जाकर बतौर संगीतज्ञ कार्य कर रहे हैं। उन्हें मंच पर अभिनय करते देखना शानदार अनुभव है। उन्होंने अनेक नाटकों का निर्देशन भी किया है। नाट्यगंगा की ऑनलाइन एक्टिंग की क्लास में उन्होंने जो बताया उससे नव रंगकर्मी निश्चित ही बहुत लाभांवित हुए होंगे। आज कार्यषाला का संचालन रोहित रूसिया ने किया। जिसमें 43 कलाकारों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। कार्यशाला के निर्देशक श्री पंकज सोनी, तकनीकि सहायक नीरज सैनी, मीडिया प्रभारी संजय औरंगाबादकर और मार्गदर्षक मंडल में श्री वसंत काशीकर, श्री जयंत देशमुख और श्री आनंद मिश्रा हैं।उनकी क्लास की मुख्य बातें इस प्रकार हैं :-
●संगीत में सुर से पहले ताल का ध्यान रखिये। हर चीज़ ताल और लय में ही चल रही है।
●शोर को लयबद्ध करके भी संगीत उत्पन्न किया जा सकता है।●हारमोनियम या मोबाइल में तानपुरा पर आप घर में सुर साधना कर सकते है।
●डायलॉग को शुद्धता से बोलने और स्क्रिप्ट को याद करने के लिए बारहखड़ी को कंठस्थ रूप से याद कीजिये।
●स्टेज पर जाने से पहले खुद को पूर्ण रूप से खाली कर लेना चाहिए और आधे घण्टे पहले से सांसो को लयबद्ध करना शुरू कर देना चाहिए , इससे स्टेज पर घबराहट या अन्य परेशानी नहीं होती और प्रदर्शन अच्छा होता है।●डायलॉग की टाइमिंग का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।●कोई जरूरी नही कि म्यूजिक के इंस्ट्रूमेंट्स होंगे तब ही संगीत होगा,हम किसी भी वस्तु से संगीत उत्पन्न कर सकते हैं। जिसे स्टोम्प म्यूजिक कहते हैं। ●संगीत हमारे जन्म के पूर्व ही हमारे साथ होता है जो कि मृत्यु तक साथ रहता है,इसलिए संगीत को समझते चलिए।
●हो सके तो संगीत सीखिए या संगीत सुनने की आदत डालिये चाहे वो क्लासिकल हो वेस्टर्न हो या अन्य कोई भी संगीत हो ।
●भ्रामरी प्राणायाम को जितना अधिक कर सकें अवश्य कीजिये,इससे आप आपके भीतर भी संगीत की उपस्थिति देख पाएंगे।
●ध्यान और योग से एकाग्रता की प्राप्ति होती है जो कि एक कलाकार के लिए सबसे ज़्यादा आवश्यक है।

mpnow.in

Iklan Tengah Artikel 1

Iklan Tengah Artikel 2

Iklan Bawah Artikel